कोई फर्क नही पड़ता इस बात से के तू जीबन में कितनी बार है हारा ।
हारने के बाद में जब जीतता है तो ये जीतना लगता है बड़ा प्यारा ।।
कितनी भी बार हार जाये इस मन से , लेकिन मन से कभी तू न हारना ।
याद रख जिस दिन तू मन से हारा तो ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा ।।
जिंदगी में हम देखते है के लोगो की ज़िंदगी सिरु होती है यानी जब बो अपनी पढ़ाई कर रहे होते है या फिर पूरी कर चुके होते है तो बो बहुत बड़े बड़े सपने देखते है और दिखाते भी है । लेकिन इस दुनिया के अंदर कुदरत का ये नियम है के बक्त से पहले और किस्मत से ज्यादा किसी को नही मिलता ।
तो क्या हम अपने बक्त का इंतज़ार करे.....? या फिर हम अपनी किस्मत का इंतज़ार करे...?
दोस्तों ये बात सच है के कुदरत का ये नियम है कि जिसको ईशवर कुछ देना चाहता है उसे बे सुमार देता है । लेकिन ईसबर उस इंसान को नही देता जो की आलसी हो जो ये चाहे की उसे सीधा खाना उस के मुह में आ जाये तो ईशवर भी उस इंसान का कुछ नही कर सकता । क्यू की ईसबर उसी इंसान को कुछ देता जो की उस चीज़ के लायक हो । अगर ईसबर आलसी इंसान को धन दे भी देता तो भी बह धन यु ही रहता या फिर उस धन से उसी के परिबार बाले आपस में आपस में लड़ लड़ के मर जाते । इस लिए हर उस काम के लिए जिस की इंसान चाहत रखता है बिना मेहनत के हासिल नही कर सकता ।
इंसान ज़िस्म से हार जाने पर हारा नही कहलाता , लेकिन अगर उस ने मन में से हार मान ली तो बो हार जाता है ।
इंसान को अपने जीबन में कितनी ही हार मिले लेकिन बो जब तक बो अपने मन में हार नही मानता बो हारा नही कहलाता और बो अपने ऊपर बिस्बास रखता है और जीतने की चाहत रखता है बो कभी ना कभी तो जीत जाता है और उस जरूर जीत मिलती है ।
इंसान ज़िस्म से हार जाने पर हारा नही कहलाता , लेकिन अगर उस ने मन में से हार मान ली तो बो हार जाता है ।
इंसान को अपने जीबन में कितनी ही हार मिले लेकिन बो जब तक बो अपने मन में हार नही मानता बो हारा नही कहलाता और बो अपने ऊपर बिस्बास रखता है और जीतने की चाहत रखता है बो कभी ना कभी तो जीत जाता है और उस जरूर जीत मिलती है ।
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